नवजात शिशु सुरक्षा को लेकर महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों में अब एक नई उम्मीद जागी है। हाल ही में राज्य के प्रमुख अस्पतालों, विशेषकर पुणे के ससून जनरल अस्पताल सहित 34 अन्य चिकित्सा संस्थानों में ‘Code Pink’ अलर्ट सिस्टम लागू किया गया है। यह इमरजेंसी प्रोटोकॉल शिशु चोरी या गुमशुदगी की किसी भी आशंका पर तत्काल प्रभाव से पूरी अस्पताल व्यवस्था को सक्रिय कर देता है। हाल के वर्षों में अस्पतालों से शिशुओं के गायब होने की घटनाओं ने माता-पिता और समाज में चिंता की लहर बढ़ा दी थी। ऐसे में Code Pink की यह पहल न सिर्फ लोगों के खोये हुए भरोसे को लौटाने का प्रयास है, बल्कि भविष्य की किसी भी अनहोनी को पूरी तरह रोकने का सशक्त उपाय भी है।
‘Code Pink’ सिस्टम क्या है?
‘Code Pink’ एक हॉस्पिटल-व्यापी इमरजेंसी प्रोटोकॉल है, जिसमें जैसे ही किसी नवजात या 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के गुम होने की खबर मिलती है, तुरन्त अलर्ट सक्रिय हो जाता है। इसके तहत—
- किसी भी स्टाफ सदस्य के संदेह या सूचना पर तुरंत अस्पताल का इमरजेंसी नंबर डायल कर ‘कोड पिंक’ सक्रिय किया जाता है।
- पूरे अस्पताल में बच्चा गायब होने की सूचना सार्वजनिक घोषणा प्रणाली के माध्यम से दी जाती है।
- सभी विभाग, जैसे लेबर रूम, आईसीयू, ओपीडी आदि, अपने-अपने क्षेत्र में फौरन तलाशी शुरू कर देते हैं।
- सिक्योरिटी स्टाफ सभी गेट बंद कर देते हैं, आने-जाने वाले लोगों व उनके बैग की जांच होती है।
- सीसीटीवी फुटेज से हर किसी की गतिविधि पर नजर रखी जाती है।
- अगर बच्चे का जल्द पता नहीं चलता, पुलिस को सूचित कर दिया जाता है।
- बच्चा मिलते ही ‘ऑल-क्लियर’ घोषित कर सामान्य व्यवस्था बहाल होती है।
क्यों था ‘Code Pink’ जरूरी?
सरकारी अस्पतालों में रोज सैकड़ों प्रसव होते हैं, भीड़भाड़ और अफरा-तफरी का माहौल रहता है। हाल ही में पुणे, सांगली जैसी जगहों पर शिशु चोरी के मामले उजागर हुए—कभी वार्ड में लापरवाही से, कभी बाहरी व्यक्ति के बहाने या भीड़ का फायदा उठाकर। इसी वजह से ‘कोड पिंक’ की शुरुआत हुई, ताकि हर शिशु, माता-पिता और परिवार को सुरक्षा व भरोसा दिया जा सके।
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नए सुरक्षा उपाय और ट्रेनिंग
‘Code Pink’ के साथ-साथ कई अन्य कदम भी उठाए गए हैं—
- हर नवजात के पैर के निशान जन्म के तुरंत बाद रिकॉर्ड किए जाते हैं।
- बच्चे को केवल प्री-आइडेंटिफाइड अभिभावक को ही सौंपा जाता है, पहचान पत्र की जांच होती है।
- महिला-शिशु वार्ड, डिलीवरी रूम, सभी एंट्री-एग्जिट गेट पर सीसीटीवी कैमरे व पैनिक बटन लगाए गए हैं।
- सुरक्षा गार्ड चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं।
- हर माह सुरक्षा जांच और तिमाही रिपोर्टिंग अनिवार्य कर दी गई है।
- स्टाफ एवं सिक्योरिटी गार्ड्स की स्पेशल ट्रेनिंग और बार-बार मॉक ड्रिल्स कराई जा रही हैं।
किन अस्पतालों में लागू हुआ?
महाराष्ट्र के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेज व उनसे जुड़े अस्पतालों (जैसे ससून, नागपुर, बभंडारा आदि) में ‘कोड पिंक’ अनिवार्य किया गया है। अन्य विभागों द्वारा संचालित अस्पतालों में इसे लागू करने के लिए अलग आदेश जारी होंगे। लेकिन कई बड़े संस्थानों में आंतरिक सुरक्षा सुविधाएं पहले से थीं, जिन्हें अब और मजबूत किया गया है।
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अनुभव, विशेषज्ञता, प्राधिकरण, विश्वास
- अनुभव: वार्ड, सिक्योरिटी, मेडिकल स्टाफ का परिचालन अनुभव
- विशेषज्ञता: स्किल्ड टीम, आधुनिक उपकरण, प्रोटोकॉल की ट्रेनिंग
- प्राधिकरण: महाराष्ट्र सरकार व स्वास्थ्य मंत्रालय का आदेश
- भरोसा: समाज में अस्पताल के प्रति विश्वास बहाल, उत्प्रेरक जागरूकता
निष्कर्ष
‘कोड पिंक’ ना सिर्फ सरकारी आंकड़ों को सुधारने की पहल है, बल्कि माताओं और परिवारों को मानसिक शांति देने का एक अहम प्रयास भी है। उम्मीद है, जल्द यह पहल देश भर के सार्वजनिक अस्पतालों के लिए मानक बन जाएगी, जिससे हर शिशु और परिवार सुरक्षित महसूस करेगा।
डिस्क्लेमर
यह लेख समाचार रिपोर्ट्स, आधिकारिक घोषणाओं और स्वास्थ्य मंत्रालय के डेटा पर आधारित है। दी गई जानकारी केवल सूचना के लिए है, किसी भी चिकित्सा या कानूनी सलाह के लिए विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।